Mauka abhi hai...
तू खिड़की बंद ना कर कि, पतंगे घुस नहीं जाएँ
पतंगे घुस भी आए तो, क्या पता ख़ुशबुएँ लाएँ.. क्या पता गुनगुना जाएँ.
तू पर्दे क्यूँ गिराता है कि कीड़े काट ना खाएँ
वो कीड़े आ भी जायें तो, क्या पता रोशनी लाएँ.. क्या पता आतिशी छाए.
दरीचे क्यूँ लगाता है कि भँवरा दे ना दे दस्तक
वो भँवरा आ भी जाए तो, तितलियाँ साथ आ जाएँ.. क्या पता रंग भर जाएँ.
क्या पता ये भी हो जाए, क्या पता वो भी हो जाए
पता चल पाएगा कैसे, जब तलक तू नहीं चाहे...
वो दिन भी पास ही होगा, तू अंतिम श्वास में होगा
यही खिड़की यही पर्दा दरीचा भी, यही होगा.
नहीं होगा तो ये मौक़ा जो तेरे पास है अब तक
अधूरी ख़्वाहिशें होंगी, ये साला वक़्त नहीं होगा..
इसलिए आज ना ख़ुद को रोक़, ख्वाहिशों को मत मन में घोंट
जो करना है तू कर ले आज, ये सब कुछ कल नहीं होगा
ये इच्छाशक्ति नहीं होगी, ये बाहु बल नहीं होगा
जो करना है तू कर ले आज, ये मौक़ा कल नहीं होगा...
ये मौक़ा कल नहीं होगा...

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